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जवानी में देश सेवा कर पाया वीर चक्र और 78 साल की उम्र में ठोकरें खाने को मजबूर पूर्व सैनिक

प्लेटा गांव के 78 वर्षीय वीर चक्र विजेता गोवर्धन सिंह का जन्म 10 अक्टूबर 1942 को शेर सिंह के घर हुआ था। पढ़ाई के दौरान 14 वर्ष की आयु में ब्वाॅयज रेजीमेंट में भर्ती हो गए। 3 वर्ष बाद उन्हें प्रथम डोंगरा में नियमित किया गया। इसके 2 वर्ष बाद उन्हें UN की शांति सेवा के साथ कांगो में तैनात किया गया। 13 सितंबर 1961 को उनकी कंपनी की एक टुकड़ी ने विद्रोहियों पर धावा बोला। दोनों तरफ से फायरिंग हो रही थी। एक विद्रोही LMG (फ्लाइट मशीन गन) के साथ टुकड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग कर रहा था। इस कारण कंपनी का आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा था। गोवर्धन सिंह अकेले आगे बढ़े और LMG को कब्जे में लेकर विद्रोहियों को मार गिराया। गोवर्धन सिंह भी गंभीर रूप से घायल हो गए लेकिन उन्होंने हौंसला नहीं छोड़ा।

सेना के अधिकारियों ने उन्हें वीर चक्र देने का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय व केंद्र सरकार को भेजा। 1962 में राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन ने उन्हें वीर चक्र देकर सम्मानित किया। जवानी में देश सेवा कर कम उम्र में वीर चक्र पाया और अब 78 साल की उम्र में घर की राह की ठोकरें खाने को मजबूर है। वीर चक्र विजेता गोवर्धन सिंह का गांव आजादी के बाद भी सड़क सुविधा से वंचित है। हालांकि यह गांव मुख्य सड़क से मात्र 2 किलोमीटर दूर है। सड़क सुविधा न होने से गांव के कई लोग यहां से पलायन कर चुके हैं। उन्होंने सड़क बनाने के लिए उपायुक्तों से भी मुलाकात की लेकिन जमीन के अभाव में योजना आगे नहीं बढ़ रही है।

उपायुक्त ने एक बार सड़क निर्माण के बजट का प्रावधान भी करवाया था। उनके वीर चक्र सम्मान को समर्पित द्वार भी खस्ताहाल है। गेट की टाइलें उखड़ गई है और इस पर अंकित उनका नाम तक भी मिट गया है। लेकिन किसी भी प्रशासनिक अधिकारी व नेता की नजर इस पर नहीं पड़ रही है। उन्होंने सरकार से गांव को सड़क से जोड़ने व गेट की मरम्मत करवाने का आग्रह किया है। वीर चक्र विजेता ने रोष जताते हुए कहा कि प्रदेश में कई सरकारें सत्ता में आईं लेकिन किसी ने भी उनके गांव को सड़क से जोड़ने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

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