विक्रम बेताल फेम कॉमेडी किंग लिलिपुट के बॉलीवुड में संघर्ष की कहानी, हफ्तों भूखे सोये लेकिन हार नहीं मानी

विक्रम बेताल फैन एमएम फारुकी जिन्हें बॉलीवुड में सभी लिलिपुट के नाम से जानते हैं दत्ता त्यागी से मशहूर हुए हैं। कुछ समय पहले इंटरनेट की सबसे अधिक देखी जाने वाली वेब सीरीज मिर्जापुर के दूसरे भाग में लिलिपुट ने दत्ता त्यागी का किरदार निभाया था। मिर्जापुर के दूसरे भाग में पुराने किरदारों की कलाकारी तो देखने को मिली ही थी लेकिन दत्ता त्यागी ने अपने अभिनय से दर्शकों को काफी प्रभावित किया है। मिर्जापुर के दूसरे भाग में कई नए किरदारों को लिया गया था लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित बिहार के गया शहर के दत्ता त्यागी ने ही किया। लिलिपुट ने अपने दमदार अभिनय से दत्ता त्यागी के किरदार को नई ऊंचाइयां दी थी।

Liliput faruqui

बिहार के गया शहर में जन्मे एमएम फारूकी जो कि बॉलीवुड में लिलिपुट नाम से मशहूर है। उनका यह नाम किसी और ने नहीं बल्कि उन्होंने खुद ही रखा है जिसके पीछे कारण है उनका छोटा कद। लिलिपुट बताते हैं कि उन्होंने यह नाम जोनाथन स्विफ्ट की नावेल गोलिवर्स ट्रेवेल से चुना है। लिलिपुट बॉलीवुड इंडस्ट्री में पिछले 36 सालों से अपने अभिनय से लोगों को प्रभावित कर रहे हैं। लिलिपुट को सबसे पहली पहचान दूरदर्शन के सबसे चर्चित धारावाहिक विक्रम और बेताल से मिली थी। बेताल के किरदार में लिलिपुट को काफी पसंद किया गया था और आज भी कई लोगों की यादों में यह धारावाहिक बसा हुआ है। लिलिपुट बताते हैं कि उन्होंने दूरदर्शन के कई धारावाहिक के लिए लेखक का काम भी किया है जिसमें विक्रम बेताल, इंद्रधनुष, देख भाई देख, नटखट, मिस्टर फंटूश शामिल है।

 

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बॉलीवुड में लिलिपुट का संघर्ष किसी फिल्मी कहानी से अलग नहीं है। उन्होंने बताया कि वह 31 दिसंबर 1975 में पैसेंजर ट्रेन से मुंबई पहुंचे थे और 1982 तक का उनका समय काफी संघर्षों भरा रहा था। बॉलीवुड एक्टर का सपना लिए जो भी मुंबई पहुंचता है उसे बहुत संघर्ष करना पड़ता है उसी प्रकार लिलिपुट ने भी कई वर्षों तक संघर्ष किया है। मात्र 130 रुपये लेकर मुंबई पहुंचे लिलिपुट के जीवन में एक समय ऐसा भी था जब काम के अभाव में उन्हें कई दिनों तक भूखा सोना पड़ा था। उन्होंने कहा कि मैं एक साधारण परिवार से हूँ जिसे एक-दो दिन भूखे रहने की आदत सी होती है। लिलिपुट ने बताया कि जब उनके दोस्त को उनकी इस हालत का पता चला तो उसने उन्हें खाने पर बुलाया।

 

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आप सभी को जानकर यह आश्चर्य होगा कि जब वह अपने दोस्त के घर पहुंचे तो कमजोरी की वजह से चक्कर खाकर नीचे गिर पड़े थे। हालांकि कुछ समय पहले एक बार फिर से उनके आर्थिक संघर्ष की खबरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी और बताया गया था कि वह काफी गरीब हो चुके हैं। खबरें यहां तक थी कि लिलिपुट आर्थिक संघर्ष के दौर से गुजर रहे हैं जिसके कारण उन्हें अपने बेटी के घर पर रहना पड़ रहा है। इतने संघर्षों के बाद भी लिलीपुट ने कभी हार नहीं मानी और उनके जहन में हमेशा यह बात रहती थी कि वह गांव जाकर लोगों का सामना कैसे करेंगे।

 

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समाचार एजेंसी से बात करते हुए लिलीपुट ने बताया कि एक समय उनके बारे में यह अफवाह थी कि वह अपनी बेटी के घर पर हैं और पूरी तरह से कंगाल हो चुके हैं। लेकिन मैं पाठकों को बताना चाहता हूं कि यह सब बातें सिर्फ अफवाह है। दरअसल अभिनय की दुनिया में आने के बाद ईश्वर की कृपा से मुझे कभी भी आर्थिक संघर्ष नहीं झेलना पड़ा। लिलिपुट बताते हैं कि एक्टिंग और राइटिंग के काम से मुझे इतने पैसे मिल जाते हैं कि मैं अपने परिवार का भरण पोषण कर लेता हूं। लिलिपुट ने बताया कि उन्होंने अपनी बेटी को घर खरीद कर दिया है जिसमें वह आराम से रहते हैं। मैं अपनी पत्नी के साथ अपने घर में शांति पूर्वक रहता हूं।

vikram betaal liliput

अपनी आमदनी को लेकर लिलिपुट ने बताया कि कुछ समय पहले ही उन्होंने साउथ की एक फिल्म की थी जिससे उनकी ठीक-ठाक आमदनी हो गई थी। आप सभी को बता दें मिर्जापुर के दूसरे भाग में दत्ता त्यागी के किरदार में लिलिपुट ने बहुत प्रशंसा प्राप्त की है। उनके इस किरदार को काफी पसंद किया गया था, जिसमें लिलिपुट ने जान डाल दी थी। लिलिपुट कहते हैं कि मिर्जापुर के बाद पैसों की कोई कमी नहीं है बहुत ज्यादा तो नहीं है लेकिन इतने जरूर हैं कि जीवन आराम से बीत जाएगा।

 

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पुराने दिनों को याद करते हुए लिलीपुट ने बताया कि थिएटर के समय कई बड़े कलाकार शो देखने आया करते थे। उसी समय गुलजार साहब भी उनका एक शो देखने आए थे जिसके बाद उन्होंने आनंद महेंद्र जी से कहा कि जाओ पहले लिलि का शो देख कर आओ। फिर आनंद जी शो देखने पहुंचे पूरा शो देख लिया उसके बाद उन्होंने गुलजार साहब से कहा कि मैंने पूरा शो देख लिया लेकिन मुझे लिली कहीं दिखाई नहीं दी। तब गुलजार साहब ने हंसते हुए आनंद जी को बताया कि मैं किसी लड़की की बात नहीं कर रहा हूं, लिलीपुट की बात कर रहा हूं। फिर जाकर मेरी मुलाकात आनंद महेंद्र जी से हुई और मेरे लिखने का कारवां यहीं से शुरू हुआ।

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