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Friday, October 22, 2021

वायरल स्टोरी: रिक्शा चालक पिता का संघर्ष लाया रंग, बेटा बना IAS अधिकारी

एक साधारण से रिक्शा चालक का बेटा अगर IAS अधिकारी बन जाए तो ये उसके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। रिक्शा चलाने वाले की कमाई में बुनियादी सुविधाएं पा लेना भी एक मुश्किल हैं, लेकिन अगर मन में इच्छाशक्ति हो कुछ पा लेने की तो इंसान मेहनत कर उसे पा ही लेता है। ऐसा ही कुछ किया हैं गोविंद जायसवाल ने जो एक साधारण से परिवार से ताल्लुक रखते हैं। अपने परिवार में सबसे छोटे गोविंद ने हर परिस्तिथि में खुद को मजबूत बनाए रखा और IAS अधिकारी बन कर दिखाया।

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अपने परिवार में सबसे छोटे गोविंद की 3 बड़ी बहने भी हैं। 12 x 8 के छोटे से कमरे में अपने परिवार के साथ रहने वाले गोविंद ने उस्मानपुरा के एक सरकारी स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और वाराणसी के सरकारी डिग्री कॉलेज से गणित में ग्रेजुएशन डिग्री हासिल की। ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद सिविल सर्विस की तैयारी के लिए गोविंद दिल्ली चले गए। मेट्रो सिटी में रहकर अपना खर्च चला पाना बहुत ही मुश्किल था लेकिन अपने बेटे की इच्छाशक्ति को देखते हुए गोविंद के पिता नारायणम जायसवाल ने अपनी एकमात्र जमीन 4,000 रुपये में बेच दी।

पहले ही प्रयास में पास कर ली यूपीएससी

अपना खर्चा चलाने के लिए गोविंद ने मैथ्स की ट्यूशन लेना शुरू किया और बचे हुए 18 से 20 घंटे पढ़ाई में जी तोड़ मेहनत की। उनकी ये मेहनत रंग लाई और साल 2006 में उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा पहले ही प्रयास में पास कर ली। UPSC की परीक्षा की तैयारी के दौरान उन्हें कई परेशानियों का सामना भी करना पड़ा। पढ़ाई के दौरान कई बार 14 से 15 घंटों के लिए लाइट चली जाती थी जिसके कारण उन्हें पढ़ने में काफी परेशानी होती थी।

एक परेशानी कम नहीं हो रही थी कि गोविंद के सामने एक और परेशानी खड़ी हो जाती। लाइट जाने के बाद उनके पड़ोस में ही जेनेरेटर चलता था जिसकी वजह से काफी शोर होता था। पढ़ाई में किसी तरह के रुकावट न हो इसके लिए वह सभी खिड़कियां बंद कर और कानों में रूई डालकर पढ़ाई करते थे। अनेक कठिन परिस्थितियों ने भी गोविंद का मनोबल नहीं तोड़ा और परिश्रम के बाद उन्होंने पहली ही एटेम्पट में UPSC सिविल सेवा परीक्षा में 48वीं रैंक हासिल की।

गोविंद की मेहनत और पिता का संघर्ष

गोविंद को इस मुकाम तक पहचान में उनके पिता नारायणम जायसवाल ने काफी संघर्ष किया। दरअसल, परिवार की स्थिति पहले इतनी खराब नहीं थी और गोविन्द के पिता 35 रिक्शों के मालिक थे लेकिन समय का फेर ऐसा हुआ की गोविंद की मां बीमार हो गई और उनके इलाज के लिए पिता ने 20 रिक्शे बेच दिए। उनकी मां नहीं बच पाई और साल 1995 में उनका निधन हो गया। इसके बाद बेटे की पढ़ाई के लिए पिता ने अपने बचे हुए 14 रिक्शा भी बेच दिए और बचा हुआ एक रिक्शा खुद चलाने लगे।

2006 में उनके पैर में टिटनेस भी हो गया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपने बेटे से टिटनेस हो जाने की बात छुपाई ताकि उसके पढ़ने में कोई भी परेशानी नहीं आए। इस बीच तीनों बहनों ने बारी-बारी से अपने पिता का ख्याल रखा। पिता के इन संघर्षो का परिणाम बेटे की सफलता के रूप में सामने आया और गोविंद ने पहले प्रयास में IAS अधिकारी बन कर दिखाया।

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