मूल्कराज आनंद पहले साहित्यकार जिन्होंने किसान आंदोलन में निभाई विशेष भूमिका

मुल्कराज आनंद जिन्हें भारत में अंग्रेजी भाषा का प्रेमचंद कहा जाता था मुल्कराज आनंद पहले ऐसे अंग्रेजी लेखक थे जिन्होंने रचनाओं में हिंदी और पंजाबी शब्दों का प्रयोग किया। मुल्कराज आनंद अद्भुत प्रतिभा और व्यक्तित्व के धनी थे। उनके लिखें अंग्रेजी उपन्यास बहुत प्रचलित है। मुल्कराज आनंद स्वभाव से काफी स्वतंत्र विचारधारा के थे।

मुल्कराज आनंद का जन्म पाकिस्तान के पेशावर जिले में 12 दिसंबर 1905 को हुआ। मुल्कराज आनंद के पिता ब्रिटिश सेना में शिल्पकार थे। मुल्कराज आनंद ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई अमृतसर के खालसा कॉलेज से पूर्ण की जिसके बाद आगे पढ़ाई करने के लिए वह इंग्लैंड चले गए। इंग्लैंड के कैंब्रिज और लंदन विश्वविद्यालय से मुल्कराज ने अपनी पढ़ाई पूरी की। जब द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ तो परिवार ने उन्हें भारत बुला लिया और मुंबई में परिवार के साथ मुल्कराज रहने लगे।

किसान आंदोलन से जुड़े

मुंबई शहर के संस्कृति कर्मी अनीश अंकुर जो कि प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े थे उन्होंने बताया मुल्कराज आनंद ने भारत लौटने के बाद प्रगतिशील लेखक संघ का पहला घोषणा पत्र लिखा था। अनीश बताते हैं मुल्कराज आनंद ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी अपना योगदान दिया जिसके चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। स्वामी सहजानंद सरस्वती जोकि किसान आंदोलन के क्रांतिकारी थे उन्होंने मुल्कराज आनंद का जिक्र अपनी आत्मकथा में भी किया था। किसान आंदोलन 1930 में जब अपने उच्च स्तर पर था तो इसे मजबूती देने के लिए स्वामी सहजानंद ने भारत में वामपंथी विचारधारा को मजबूत बनाने में सहयोग प्रदान किया।

दलितों के लिए उठाई आवाज़

स्वामी सहजानंद इतने प्रतिभाशाली व्यक्ति थे जिनसे कोई भी प्रभावित हो जाता था। स्वामी जी से प्रभावित होकर रामधारी सिंह दिनकर, नागार्जुन, रेणु, रामवृक्ष बेनीपुरी और राहुल सांकृत्यायन के साथ मुल्कराज आनंद ने हो रहे बदलाव को अपना सहयोग दिया। किसान आंदोलन में मुल्कराज आनंद ने पटना शहर और सभी जिलों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, यही कारण था कि उनके पहले उपन्यास “अनटचेबल” जिसमें दलितों की आवाज उठाई गई को पूरे देश में प्रसिद्धि मिली।

पद्म भूषण से हुए सम्मानित

मुल्कराज आनंद ने अपने जीवन में कई उपन्यास लिखे जिनमें कुली, द विलेज, टू लीव्स एंड अ बड, द सोर्ड एंड द सिकल, अक्रॉस द ब्लैक वाटर्स काफी प्रसिद्ध हुए। मुल्कराज आनंद को अपने दिए गए सहयोग और उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए भारत सरकार द्वारा साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में वर्ष 1967 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

साहित्य अकादमी आनंद को 1972 में उनके लिखे गए उपन्यास मॉर्निंग फेस के लिए पुरस्कार भी दिया। मुल्कराज आनंद को लिखने का बहुत शौक था और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक लिखना जारी रखा था। 28 दिसंबर 2004 को 99 वर्ष की आयु में मुल्कराज आनंद का देवलोक गमन हुआ।

मुल्कराज आनंद की कहानियां आज़ादी के पहले और उसके बाद के दौर का आखों-देखा बयान सरीखी हैं। 1946 में लिखी अपनी किताब ‘अपॉलॉजी फॉर हीरोइज्म’ में वे समाजवाद को इंसान की सभी समस्याओं का हल मानते हैं। उनके मुताबिक़ इसी से आर्थिक और राजनैतिक आज़ादी प्राप्त होगी और ऐसा कभी नहीं हो सकता कि मानवता इस धरती से ख़त्म हो जाए। वे मानते रहे कि मनुष्य हर सूरत में आगे बढ़ सकता है और उसे बढ़ना ही होगा. यही जिजिविषा उनके 25 उपन्यासों और कई कहानियों के किरदारों में नज़र आती है. उन्होंने भारत में अंग्रेज़ी लेखन को नए विचार से जोड़ा था और आज के तमाम अंग्रेजी लेखकों वे पितामह कहे जा सकते हैं.

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