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शिवसेना कर सकती है घर वापसी! बाल ठाकरे के "माना" ने माना, भाजपा के साथ जाना ही उचित

शिवसेना की कमाई ही हिंदुत्व की राजनीति है। महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए उस पर इसी एजेंडे से समझौते के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय स्तर पर सरकार गठन के बाद से सैकड़ों नेता इसी वजह से पार्टी छोड़ कर चले गए। ऐसे में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर वह नहीं चाहती कि इन आरोपों को बल मिले। नागरिकता संशोधन विधेयक पर शिवसेना के “पेंडुलम स्टैंड को लेकर उसकी खासी आलोचना हो रही है। एआईएमआईएम के नेता और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने चुटकी लेते हुए कहा कि यह भांगड़ा पॉलिटिक्स है। ओवैसी ने कहा, “कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में महा अगाड़ी सरकार “सेक्यूलर” है। ऐसे में उस बिल का समर्थन जो धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है, अवसरवादी राजनीति से कुछ नहीं।” लोकसभा में सोमवार को जब नागरिकता बिल पर वोटिंग हुई तो शिवसेना के 18 सांसदों ने पक्ष में वोट दिया। उसका यह कदम बिल का विरोध कर रही महाराष्ट्र सरकार की सत्ता में साझेदार कांग्रेस को रास नहीं आया। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बिल का समर्थन करने वालों को अब देशद्रोही करार देने की कोशिश की तो शिवसेना के सुर बदल गए। उद्धव ने कहा कि उनकी पार्टी राज्यसभा में इस बिल का तब तक समर्थन करेगी जब तक कुछ चीजें स्पष्ट नहीं हो जाती है। इससे पहले पार्टी सांसद अरविंद सावंत ने कहा था कि राज्यसभा में भी पार्टी हिंदुत्व को लेकर अपने स्टैंड से पीछे नहीं हटेगी।

महा विकास अघाड़ी (शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी) ने अपनी सरकार भले ही बना ली हो, लेकिन गठबंधन साझेदारों के बीच का मतभेद खत्म होता नहीं दिख रहा है। यही कारण है कि अपने साथ शपथ लेने वाले मंत्रियों को मनपसंद कार्यालय दे चुके मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे आज तक अपने विभाग का बंटवारा नहीं कर पाए। उद्धव ने छह मंत्रियों के साथ 28 नवंबर को बड़े तामझाम के साथ शपथ ली थी। तीनों दलों की तरफ से 2-2 मंत्रियों ने मंत्री पद की शपथ ली थी। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और शिवसेना के दिग्गज मनोहर जोशी ने भविष्य में भाजपा के साथ आने के संकेत दिये हैं। उन्होंने कहा, “मेरी राय में यह ज्यादा अच्छा होता कि शिवसेना और भाजपा साथ रहते। लेकिन दोनों पार्टियां फिलहाल ऐसा नहीं कर रही है। उनका बयान ऐसे वक्त आया जब नागरिकता संशोधन विधेयक पर स्टैंड को लेकर पार्टी की छीछालेदार हो रही है।” तीनों दलों के बीच मतभेद को लेकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है, “विधानसभा का शीत-कालीन सत्र केवल 6 दिनों के लिए बुलाया गया है। अब तक न तो मंत्रियों को विभाग बांटे गए हैं, और न ही कैबिनेट का विस्तार किया गया है। यह सत्र केवल परंपरा के निर्वाह के लिए बुलाया गया है, क्योंकि किसी को पता नहीं है कि इस हालत के लिए जिम्मेदार कौन है।”

सीएम बनने के बाद से उद्धव कई बार हिंदुत्व पर जोर भी दे चुके हैं। लेकिन, उनकी परेशानी यह है कि शिवसेना जब भी ऐसा करते दिखने की कोशिश करती है राज्य की सत्ता के साझेदार उसकी लगाम खींचने लगते हैं। उपमुख्यमंत्री, महकमों को लेकर पहले से मतभेद चल रहे हैं। ऐसे में उद्धव बखूबी जानते कि हिंदुत्व के एजेंडे पर जोर देने से उनकी सरकार की अकाल मौत हो सकती है। वैसे इसकी संभावना सरकार गठन के वक्त से ही जताई जा रही है। असल में, शिवसेना की दिक्कत यह है कि उसकी कमाई ही हिंदुत्व की राजनीति है। महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए उस पर हिंदुत्व के एजेंडे से समझौते के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय स्तर पर सरकार गठन के बाद सैकड़ों नेता इसी वजह से पार्टी छोड़कर गए। ऐसे में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर यह नहीं चाहती कि उस पर लगे आरोपों को बल मिले।

इसके अलावा कर्नाटक में कांग्रेस से बगावत कर भाजपा का साथ देने वाले विधायकों को उप चुनाव में जनता ने जिस तरह आंखों पर बिठाया है, उससे भी शिवसेना सशंकित होगी। यह आशंका उसके मन में गहरे बैठी होगी कि भाजपा का साथ छोड़ने पर उसका भी ऐसा ही हश्र हो सकता है। यही कारण है कि मनोहर जोशी ने निजी राय बता कर भविष्य में दोनों दलों के साथ आने के संकेत दिए हैं। शिवसेना में जोशी की हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में 1993 में जब पहली बार शिवसेना सत्ता में आई थी तो उद्धव के पिता बाल ठाकरे ने उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में चुना था। लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके जोशी को बाल ठाकरे “माना” (मनोहर) कहा करते थे।

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