मजहब की तमाम बाधाओं को तोड़ गुलशन बनी कन्या गुरुकुल की नई उम्मीद, सपना किया पूरा

बेटियां किसी भी धर्म की हो उनके प्रति समाज की अवधारणा एक सी है। उन्हीं बेटियों में से गुलशन भी एक है। जो आज भी कट्टरपंथियों के निशाने पर रहती हैं। तमाम बाधा आने के बाद भी गुलशन नहीं मुरझाईं। गुलशन ने जब अपने चारों और देखा तो बेटियों को बंदिशों में ही पाया। मजहब की दीवारों को तोड़कर गुलशन कन्या गुरुकुल की नई उम्मीद बन गई। उसने ममत्व से इस आंगन को सींचाऔर बच्चियों को शिक्षा दी। बचपन से उसके अंदर समाज के लिए कुछ करने का जज्बा था। जब रश्मि ने बाहर से आकर गुलशन के गांव में बेटियों को शिक्षा की अलख जगाई तो उसे भी राह मिल गई। गुरुकुल के संचालन में रश्मि का हाथ बंटाया।

नि:शुल्क सेवा के सफर को 14 साल हो चुके हैं। नारंगपुर का श्रीमद् दयानंद उत्कर्ष आर्ष कन्या गुरुकुल इस नजर से भी बहुत मायने रखता है। वह धर्म, जाति के बंधनों से परे है। गुलशन का मकसद इस संकीर्ण मानसिकता से बहुत ऊपर है। गुलशन का परिवार उसकी ढाल बनकर खड़ा है। वहां आजाद ख्यालों का गुलशन भी खिलता है। उसने खुद को गुरुकुल को समर्पित किया। उसे लगा उसकी जरूरत है वहां पर। इसलिए गुरुकुल में पढ़ाते हुए अपनी शिक्षा पूरी की। 2005 में रश्मि आर्य ने गांव के छोटे से घर से इसकी शुरुआत की थी। गुरुकुल के प्रचार में रहने के कारण बच्चों को पढ़ाने में परेशानी होती थी। तब गुलशन और उसकी बहन इस मुहिम में रश्मि के साथ आई। तब से वह रश्मि आर्य के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बेटियों को सशक्त बनाने का काम कर रही हैं। गुलशन उस समय 10वीं की छात्रा थी।

एमबीए, एलएलबी कर चुकी गुलशन का कहना है मुझे बचपन से ही समाज सेवा में रूचि थी। मैंने सोचा जब दीदी बाहर से आकर हमारे क्षेत्र में बेटियों को शिक्षित कर रही हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकती। मेरे पिता ने इस कदम में मेरा साथ दिया। परिवार ने बहुत झेला। बहनों की शादी में दिक्कत आई। बच्चियां मुझसे बहुत घुली-मिली हैं। इन लड़कियों को पढ़ाने से लेकर उनके भोजन आदि की व्यवस्था में, दीदी का हाथ बंटाती हूं। मुझे अच्छा लगता है कि मैं कुछ सार्थक कर रही हूं। हिंदू और मुस्लिम दोनों को मुझसे दिक्कत होती है। मैं कहती हूं, मैंने गुरुकुल को 14 साल दिए हैं। मैं यहां आना छोड़ दूंगी, लेकिन क्या आप लोग इस सेवा को करेंगे? तब लोग शांत हो जाते हैं, गुरुकुल मेरा दूसरा घर है।

गुरुकुल की संचालक रश्मि आर्य ने बताया मेरे बाद यहां की सारी जिम्मेदारी गुलशन संभालती है। लोगों उसे कहते हैं, तू हिंदू बन गई है। पर उसे इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे इस सेवा में मजा आता है। 13-14 साल से वह हमारे साथ जुड़ी है। गुलशन ने कहा पहले गांव की 4-5 लड़कियां ही गुरुकुल में शिक्षा लेने आती थी। समय के साथ-साथ लोगों की सोच बदली है। नारंगपुर व आस-पास के लोग नवरात्रि में गुरुकुल की लड़कियों को हवन कराने के लिए बुलाते हैं। यहां की बेटियां शांति यज्ञ में भी जाती हैं। लोग विवाह में भी गुरुकुल की लड़कियों को मंत्रोचार के लिए बुलाते हैं। गुरुकुल को लेकर लोगों की धारणा बदल चुकी है। पहले एक कटोरा अनाज देने में भी लोग हिचकिचाते थे। गुरुकुल की लड़कियां खेलों में भी अपनी प्रतिभा दिखा रही हैं।

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