अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना दिव्यांग बेटी प्रियंका बनी कांगड़ा की पहली सिविल जज

कुछ के सपने साकार हो जाते हैं तो कुछ उसे सच करने की कोशिश में दिन रात लगे रहते हैं। ऐसा ही होता है जब किसी की बरसों की मेहनत, दिन रात जागने की तपस्या और हर पल संघर्ष, एक बड़ी तपस्या में तब्दील होता है। प्रियंका ठाकुर की कहानी मुश्किलों से जूझते नौजवानों के लिए एक प्रेरणा है। बता दें, कि प्रियंका देख नहीं सकती लेकिन उन्होंने ऐसा कर दिखाया जिसका सपना आंखों से सक्षम लोग भी देखते हैं। चुनौतियों से हार न मानकर जहां उन्होंने अपने मां-बाप का नाम रोशन किया है वहीं दूसरों के लिए प्रेरणा सोत्र भी बनी हैं। अगर प्रतिभा और लगन हो तो विकलांगता भी रास्ते में किसी प्रकार का रोड़ा नहीं डाल सकती है यह बात सिद्ध की है प्रियंका ठाकुर ने।

LLM फर्स्ट डिवीजन, UGC नेट भी पास कर PHD कर रही कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) के गांव वडाला की दिव्यांग बेटी अब सिविल जज बन चुकी है। वह बताती हैं कि कभी भी दूसरों की नकारात्मक सोच को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। आखिर उन्हें अपनी मेहनत में सफलता मिली। कांगड़ा के छोटे से गांव वडाला की दिव्यांग प्रियंका ठाकुर ने सिविल जज बन कर यह साबित कर दिया कि अपनी प्रतिभा और मेहनत से लड़कियां बड़ी से बड़ी कामयाबी हासिल कर समाज के लिए मिसाल बन सकती हैं। हिमाचल विश्वविद्यालय से कानून में PHD कर रही प्रियंका ठाकुर का हिमाचल प्रदेश न्यायिक सेवा के लिए चयन हुआ है। उन्हें इस कठिन परीक्षा में टॉप टेन में स्थान मिला है। उनकी नियुक्ति बतौर सब जज होगी। इससे पहले वह हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र से LLB करने के बाद वहीं से LLM परीक्षा में फर्स्ट डिवीजन पास कर इस समय PHD कर रही हैं। साथ ही प्रियंका UGC नेट भी पास कर चुकी है।

प्रियंका का कहना है कि हिमाचल में यह चौथा प्रयास था, जिसमें उन्हें सफलता मिली है। उमंग फाउंडेशन से जुड़ी 54% दिव्यांग प्रियंका ठाकुर अपने कठिन परिश्रम और अपनी सफलता का श्रेय अपने पिता सेवानिवृत्त संयुक्त निदेशक अभियोजन नरेश घई और माता सृष्टा देवी घई को तथा स्कूल और विश्व विद्यालय के अध्यापकों सहित अपने मुश्किल दौर में काम आए दोस्तों को देती है।उनका कहना है कि दृढ़ निश्चय हो तो एक न एक दिन मेहनत रंग जरूर लाती है। आज सिर्फ इस उपलब्धि से परिवार में ही नहीं, बल्कि पूरे वडाला गांव में खुशी का माहौल है।

इंटरव्यू में हैदराबाद एनकाउंटर पर था पहला सवाल
प्रियंका ठाकुर कहती है कि इंटरव्यू के दौरान मुझसे पूछा गया कि आज की डेडलाइन क्या है? इस बारे में मैंने हैदराबाद में हुए गैंगरेप के एनकाउंटर के बारे में बताया। मुझसे पूछा गया कि हैदराबाद में हुए गैंगरेप के एनकाउंटर को आप कितना सही मानते हैं। मैंने इसका जवाब देते हुए कहा कि कानून का सम्मान होना चाहिए। कानून के नियमों की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। प्रियंका कहती है उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उनका शारीरिक रूप से दिव्यांग होना था। लोग कहते थे वह कुछ नहीं कर सकती। उन्होंने खुद ही अपने आप को संभाला। पढ़ाई जारी रखी और अपनी इस कमजोरी को अपनी ताकत बनाया। कुलपति प्रोफेसर सिकंदर कुमार ने प्रियंका को बधाई देते हुए कहा कि यह विश्वविद्यालय के लिए गौरव की बात है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय कार्यकारिणी परिषद EC के सदस्य और विकलांग पदाधिकारी प्रोफेसर अजय श्रीवास्तव कहते हैं कि शारिरीक रूप से दिव्यांग प्रियंका ने अपने हौसले, मेहनत से अपना यह मुकाम हासिल किया है।

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