दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद चित्रकार ने बनाई राष्ट्रीय स्तर पर पहचान, PM मोदी ने कुर्सी छोड़कर लगाया गले

“अपने हाथों की लकीरों को क्या देखते हो, किस्मत तो उनकी भी होती है, जिनके हाथ नहीं होते।”

सूरत के दिव्यांग मनोज भींगारे इन पंक्तियों का साकार रूप हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि इंसान की किस्मत हाथों से नहीं मनोबल, मेहनत और लगन से लिखी जाती है। दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद मनोज सफल चित्रकार हैं। वह माउथ पेंटिंग के जरिए राज्य और राष्ट्रीय स्तर में कई पुरस्कार जीत चुके हैं। सिंगापुर और कतर में आयोजित चित्र प्रदर्शनी में उनके चित्रों को सराहा गया। मुंह से ब्रश पकड़कर बनाना शुरू किए चित्र विदेशों में भी सराहे गए।

वर्ष 1994 में जब मनोज पांचवी कक्षा के छात्र थे। तब वह पिता गोपाल और मां शोभा के साथ बस से नासिक गए थे। हादसे में उनका एक हाथ मौके पर ही कट गया था। जबकि दूसरे पर गंभीर चोटआई बाल चिकित्सकों को उनका दूसरा हाथ काटना पड़ा। मनोज के दोनों हाथ गंवाने से परिवार पर जैसे आसमान टूट पड़ा। दोस्त-रिश्तेदार दिलासा देते तो परिवार की पीड़ा और बढ़ जाती। नवागाम डिंडोली निवासी मनोज भिंगारे अपने चित्रकला से देश-विदेश में जाने जाते हैं। उनकी चित्रकला की खास बात यह है कि वह हाथों से नहीं मुंह में ब्रश दबाकर चित्र बनाते हैं।

मनोज का कहना है कि शादी के बाद उनकी पत्नी भावना उनके लिए संबल बनी। मनोज ने गांधीनगर के सद परिवार विकलांग पुनर्वास केंद्र में 11वीं और 12वीं की पढ़ाई की। इसके बाद अहमदाबाद के सी एन महाविद्यालय में फाइनल आर्ट्स में प्रवेश लेने पहुंचे। लेकिन संस्था ने यह कह कर प्रवेश देने से मना कर दिया कि दोनों हाथ नहीं होने से यह अपने काम कैसे करेगा। सूरत लौटकर मनोज ने मुंह और पैरों से लिखना तथा अपने काम खुद करना शुरू किया। 1996 में वह फिर अहमदाबाद पहुंचे। इस बार मुंह और पैरों से उनके काम को देख संस्था ने उन्हें प्रवेश दे दिया। मनोज ने बताया कि 1999 में उन्होंने दिल्ली में हुई चित्रकला स्पर्धा में हिस्सा लिया इसमें उन्हें राष्ट्रीय बाल श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यहीं से उन्होंने चित्र कला के क्षेत्र में भविष्य बनाने की ठान ली।

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