5 रुपये के लिये खेतों में की मजदूरी, आज बनी 1.5 करोड़ की कंपनी की CEO

मुश्किलों को मात देना कोई ज्योति रेड्डी (47) से सीखे। आज वह हमारे बीच किसी नजीर से कम नहीं है। एक दौर था जब उन्हें दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ती थी। कड़ी धूप में वह 10 घंटे तक पत्थर तोड़ती थी। गरीबी की मार के चलते कई बार घर में अन्न भी खत्म हो जाता था। ऐसे में भूखे पेट ही सोना पड़ता था। जो महिला कभी ₹5 के लिए खेतों में मजदूरी करती थी। आज वह अमरीका की सॉफ्टवेयर कंपनी की CEO है और वह महंगी कार में घूमती है। जिंदगी की रुकावट को पार करते हुए तेलंगाना की ज्योति रेड्डी ने आखिर अपना मुकाम बना लिया। जहां उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता था। आज उस कंपनी की CEO है।जिसमें 100 से अधिक लोग काम करते हैं। उनके कंपनी का टर्नओवर 1.5 करोड़ डॉलर से अधिक है। ज्योति ने अपने कड़े संघर्ष से यह साबित कर दिया था कि अभाव किसी व्यक्ति को सफल होने से नहीं रोक सकता।तेलंगाना की गांव की रहने वाली ज्योति ने सफलता की बुलंदियों को चुमा।

बेहद गरीबी में गुजारा बचपन
अमेरिका की फीनिक्स स्थित सॉफ्टवेयर सॉल्यूशन इंक की CEO ज्योति रेड्डी का जन्म 1970 में तेलंगाना के एक गरीब परिवार में हुआ। ज्योति के परिवार में माता-पिता के अलावा चार और बहनें थीं। जिसमें ज्योति सबसे छोटी थी। परिवार से पैसों की कमी के कारण ज्योति की पढ़ाई लिखाई नहीं हो सकती थी। इसलिए उसे अनाथालय में रहना पड़ा। अनाथालय में रहने के लिए एक नियम था कि आपको यह साबित करना पड़ेगा कि आप बिन मां की बच्ची हो। ऐसे में ज्योति जब तक अनाथालय में रही अपनी मां से नहीं मिल सकी। ज्योति के लिए यह दौर काफी मुश्किल था। अनाथालय में वह अपने सुख-दुख किसी से बांट नहीं पाती थी।

पारिवारिक हालत इतनी खस्ता थी कि उन्होंने तीन बार खुदकुशी का प्रयास किया था। एक बार तो अपनी बच्ची को भी जिंदा जलाने की कोशिश कर ली। कुछ समय बाद वह नेहरू युवा केंद्र पर रात में पढ़ाने लगी। उन्हें वहां ₹120 मिलते थे। यह रकम उनके बच्चों के लिए काफी काम आई।फिर ज्योति ने अंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी से वोकेशनल कोर्स किया। अमेरिका में अपनी कजिन के पास गई। पर उसने पहले हैदराबाद में कंप्यूटर की बारीकियां जानी समझी। साल 1994 के आसपास उनकी तनख्वाह ₹5000 थी। टीचर के साथ मिलकर चिटफंड भी चलाती थी। तो उसमें ₹25000 कमाए। यूएस जाने में इसी रकम ने उनका साथ दिया।

ढाई किमी नंगे पांव चल कर पढ़ने जाती

आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना)के वारंगल जिले के गुडेम किसान परिवार में जन्मी ज्योति के पिता वेंकटरेड्डी बच्चों को दो वक्त का खाना देने में भी असमर्थ थे। उन्होंने ज्योति को एक अनाथालय में भेज दिया था। जब ज्योति की शादी हुई तो वह 16 साल की थी। उसके पति सम्मी रेड्डी किसान थे। सिर्फ ₹5 के लिए उन्हें दूसरों के खेतों में 10 घंटे मजदूरी करनी पड़ती थी। शादी के बाद जगज्योति की दो बेटियां हुई तो उसने कुछ करने की सोची।

मजबूत इरादों के साथ वापस आई

न्यूजर्सी में वह एक गुजरात परिवार के यहां किराए पर रही उन्होंने तब कई तरह के काम किए। 2 साल बाद भारत लौटीं तो एक पुजारी ने सलाह देते हुए कहा था,”तुम वहां कारोबार करोगी तो करोड़पति बन जाओगी।” उन्होंने इसके बाद धीरे-धीरे अपना कारोबार शुरू किया आज वह बुलंदियों पर है।उनके गुरु ने कहा कि तुम खुद का बिजनेस करो। इसके बाद ज्योति फिर मजबूत इरादों के साथ वापस अमेरिका गई और वहां विजा प्रोसेसिंग के लिए एक कंसल्टिंग कंपनी खोल ली। उन्होंने पहली बार में ही $40,000 की बचत कर ली। फिर सॉफ्टवेयर सॉल्यूशन नाम से अपनी खुद की कंपनी खोल ली ।आज उनकी कंपनी का टर्नओवर 1.5 करोड़ से अधिक है।

अमेरिका में नौकरी का सपना

ज्योति अमेरिका में नौकरी के सपने देखा करती थी। उसके कंप्यूटर साइंस में पीजी डिप्लोमा किया। मार्च 2000 में ज्योति को अमेरिका से नौकरी का ऑफर आया। उसने अपनी दोनों बेटियों को हॉस्टल में भेज दिया और अमेरिका निकल गई।

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