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क्या कम वोट पाकर भी Donald Trump राष्ट्रपति बने रह सकते हैं?

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों को लेकर कयास लग रहे हैं कि जो बिडेन या डोनाल्ड ट्रंप में किसका पलड़ा भारी है? अप्रूवल रेट लगातार इशारा कर रहे हैं कि पद पर बिडेन की दावेदारी ज्यादा मजबूत है. वहीं ट्रंप लोकप्रियता में पीछे दिख रहे हैं. यानी अगर अप्रूवल रेट पर भरोसा करें तो ट्रंप को कम वोट भी मिल सकते हैं. हालांकि कम या ज्यादा वोट से अमेरिका में हार-जीत तय नहीं होती. साल 2016 में ट्रंप का वोट काउंट हिलेरी क्लिंटन से 3 मिलियन कम था लेकिन वही राष्ट्रपति बने. जानिए, ऐसा कैसे होता है.

फिलहाल अमेरिका में 3 नवंबर को चुनाव निर्धारित है, यानी 2 महीने से भी कम समय है. इस बीच चुनाव से पहले के रुझान बता रहे हैं कि ट्रंप के मुकाबले बिडेन ज्यादा लोकप्रिय हैं. हालांकि हो सकता है कि ज्यादा वोट पाकर भी कोई राष्ट्रपति न बन सके. इसकी वजह ये है कि यूएस में राष्ट्रपति जनता के वोट से नहीं बनता, बल्कि इसके लिए इलेक्टोरल कॉलेज काम करता है.

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ये इलेक्टोरल कॉलेज असल में एक बॉडी है, जो जनता के वोट से बनती है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जनता के वोट से अधिकारियों का एक समूह बनता है, जो इलेक्टोरल कॉलेज कहलाता है. ये इलेक्टर्स होते हैं और मिलकर राष्ट्रपति चुनते हैं. उप-राष्ट्रपति भी यही बॉडी चुनती है.

अप्रूवल रेट लगातार इशारा कर रहे हैं कि पद पर बिडेन की दावेदारी ज्यादा मजबूत है (Photo- CNBC)

इलेक्टोरल कॉलेज अलग तरह से काम करती है. इसमें कुल 538 सदस्य होते हैं लेकिन हर स्टेट की आबादी के हिसाब से ही उस स्टेट के इलेक्टर्स चुने जाते हैं. यानी अगर कोई स्टेट बड़ा है, तो उससे ज्यादा इलेक्टर चुने जाएंगे ताकि वो अपनी आबादी का प्रतिनिधित्व सही तरीके से कर सकें. जैसे कैलिफोर्निया की आबादी ज्यादा हैं इसलिए वहां 55 इलेक्टर हैं. वहीं वॉशिंगटन डीसी में केवल 3 ही सदस्य हैं, जो राष्ट्रपति चुनने में रोल अदा करेंगे.

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए 270 या उससे ज्यादा वोटों की जरूरत होती है. किसी राज्य में जो भी पार्टी जीतती है, सारे इलेक्टर्स उसी के हो जाते हैं. यही वजह है कि अमेरिका में सारे राज्यों पर फोकस करने की बजाए उम्मीदवार कुछ खास-खास राज्यों पर फोकस करता है ताकि अगर उसकी पार्टी जीते तो इलेक्टोरल कॉलेज में उसकी सदस्य संख्या ज्यादा हो जाए. ऐसे में वो राष्ट्रपति पद के ज्यादा करीब होता जाता है.

उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए 270 या उससे ज्यादा वोटों की जरूरत होती है

यही वजह है कि वोटरों के बीच ज्यादा लोकप्रिय होने के बाद भी इसी गारंटी नहीं है कि उम्मीदवार प्रेसिडेंट बन ही जाएगा. अगर उसे इलेक्टोरल कॉलेज में 270 वोट नहीं मिल सके तो हार तय है. जैसे कि पिछले चुनाव में भी हुआ था, जब हिलेरी को वोटर्स से ज्यादा प्यार मिला लेकिन वे जीत नहीं पाईं. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में पिछले पांच चुनावों से लगातार यही ट्रेंड चल रहा है.

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वैसे अगर किसी को भी मेजोरिटी न मिले तो इसका भी तोड़ सोचा गया है. इन हालातों में अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव के पास ये अधिकार है कि वो आपस में वोट करके प्रेसिडेंट चुन सकते हैं. हालांकि ऐसा आजतक एक ही बार हुआ है. साल 1824 में चार उम्मीदवारों के बीच इलेक्टोरल कॉलेज बंट गया और किसी को भी मेजोरिटी नहीं मिल पाई. तब ये हुआ था. लेकिन इस बार चूंकि दो ही पार्टियां हैं, लिहाजा यहां तक जाने की नौबत नहीं आएगी.

ज्यादा लोकप्रिय होने के बाद भी इसी गारंटी नहीं है कि उम्मीदवार प्रेसिडेंट बन ही जाए (Photo-ndla)

सीएनएन के सर्वे में भी बिडेन ट्रंप से आगे दिख रहे हैं. SQL Server Reporting Services (SSRS) की मदद से हुए इस सर्वे के अनुसार ट्रंप को जहां 42 प्रतिशत वोटर ही सपोर्ट कर रहे हैं, वहीं बिडेन उनसे 10 प्रतिशत आगे हैं. इस तरह के 6 टेलीफोनिक सर्वे हुए. इनमें से दो सर्वे बिडेन द्वारा कमला हैरिस को उप-राष्ट्रपति पद का दावेदार बनाने को लेकर भी थे. इसी तरह से मनीकंट्रोल ने भी सीएनएन की एक खबर से हवाले से इसपर एक रिपोर्ट की. इसमें बताया गया है कि कैसे 54 प्रतिशत रजिस्टर्ड वोटरों ने ट्रंप के लिए नकारात्मक प्रतिक्रिया दी. दूसरे सर्वे में भी इसी तरह के रुझान दिख रहे हैं. वॉशिंगटन पोस्ट और एबीसी न्यूज पोल के मुताबिक ट्रंप की रेटिंग 43 प्रतिशत अप्रूवल तक सिमटी हुई दिखी. वहीं वॉल स्ट्रीट जर्नल और फॉक्स न्यूज के अनुसार ट्रंप के लिए ये प्रतिशत 44 तक जा रहा है.

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जून के बाद से लगभग हर एजेंसी की रेटिंग में जो बिडेन ने लीड ली है, इसके अलावा वो ऐसे राज्यों में भी बढ़त बना रहे हैं जिन्हें वाइट पावर हाउस माना जाता है. यानी वो स्टेट्स जिन्हें रिपब्लिकन पार्टी का गढ़ माना जाता है. इन स्टेट्स में फ्लोरिडा, टेक्सास, जॉर्जिया जैसे राज्य हैं. कोरोना वायरस के मामले में नाकामयाबी को भी ट्रंप के पीछे रहने की एक वजह माना जा रहा है. साथ ही कुछ महीनों पहले अश्वेत मूल के व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस हिरासत में मौत के बाद से लोग ट्रंप की सत्ता को नस्लभेदी मानते दिख रहे हैं और कथित तौर पर उनसे दूरी बना रहे हैं.


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